ऋषि भरद्वाज कौन थे?
ऋषि भरद्वाज सप्तर्षियों में से एक हैं। ऋग्वेद का छठा मंडल उनके और उनके वंश के कवियों से जुड़ा माना जाता है। महाभारत में वे द्रोणाचार्य के पिता हैं, जो पांडवों और कौरवों के गुरु थे।
भारद्वाज गोत्र होने का मतलब
अगर आपका गोत्र भारद्वाज है, तो परंपरा के अनुसार आपके पिता की वंश-रेखा ऋषि भरद्वाज तक जाती है। यह गोत्र कई समुदायों और क्षेत्रों के परिवारों में मिलता है, इसलिए इससे जाति का पता नहीं चलता, और आज के दो भारद्वाज परिवार आमतौर पर करीबी रिश्तेदार नहीं होते।
क्या भारद्वाज गोत्र में शादी हो सकती है?
बहुत-से परिवार इससे बचते हैं। परंपरा के अनुसार एक ही गोत्र के लोगों को एक पूर्वज की संतान माना जाता है, इसलिए भारद्वाज–भारद्वाज रिश्ता अक्सर कुंडली मिलान से पहले ही मना हो जाता है।
भारतीय कानून सगोत्र विवाह पर रोक नहीं लगाता। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में गोत्र का कोई ज़िक्र नहीं है। अधिनियम सपिंड रिश्तों (पिता की ओर से पाँच और माता की ओर से तीन पीढ़ियाँ) और कुछ नज़दीकी रिश्तेदारों, जैसे पहले चचेरे-ममेरे भाई-बहनों, के बीच विवाह पर रोक लगाता है, जब तक कोई मान्य प्रथा इसकी अनुमति न दे। Sapinda rule (English)
गोत्र क्या नहीं बता सकता
गोत्र सिर्फ़ पिता की वंश-रेखा को दिखाता है। माँ की ओर के भाई-बहनों (जैसे मामा या मौसी के बच्चों) का गोत्र आमतौर पर अलग होता है। इसलिए अलग गोत्र होने का मतलब यह नहीं कि आप रिश्तेदार नहीं हैं। दो लोग असल में कितने करीबी रिश्तेदार हैं, यह सिर्फ़ DNA जाँच बता सकती है।